जय श्री कृष्ण : पर कौन से कृष्ण ?
मैं भी उन लोगों और खास तौर से उन यादवों में शामिल हूँ जो श्री कृष्ण को अपने आराध्य मानते हैं, पूर्वज समझते हैं।
पर मैं उनलोगों में शामिल नहीं हूँ जो श्री कृष्ण की व्याख्या और वर्णन गीता के उस नायक से करते हैं जो अपने कई श्लोकों में "ब्राह्मणवाद" के पोषक नज़र आते हैं। हमारे श्री कृष्ण वो हैं जो "ब्राह्मणवाद" के सबसे श्रेष्ठ देवता इंद्र के पूजा के विरोधी हैं और उन्हें सबक सिखाने के लिए इंद्र हर संभव कोशिश करते हैं। परन्तु श्री कृष्ण मथुरावासियों की न सिर्फ रक्षा करते हैं अपितु इंद्र को पराजित होने पर विवश करते हैं।
तब तो काल्पनिक "सुदामा" के चरित्र को जोर शोर से उभारना ज़रूरी हो गया था।
मैं इस पोस्ट में विस्तृत चर्चा नहीं करूँगा क्योंकि यह शोध उपरांत एक लेख का विषय होगा।
ब्राह्मणवाद की एक बड़ी खासियत है, "धर्म" के नाम पर बनाये गए उनके नियम और आडम्बर से वे सामाजिक और राजनैतिक तौर पर अपने वर्चस्व को बनाये रखते हैं। अगर उन्हें कोई गंभीर चुनौती मिलती है तो उस ताक़त या संगठन को अपने सांस्कृतिक ताने बाने में समेट कर उसे इसी "ब्राह्मणवाद" में समाहित कर लेते हैं।
इसी क्रम में : जिनसे जीत नहीं सकते उन्हें मिला लो।
ऋग्वेद से लेकर तमाम शास्त्रों में अहीर व अहीर नायक कृष्ण अनार्य कहे गए हैं लेकिन इसके बावजूद जब इस देश के मूल निवासियों में कृष्ण का प्रभाव कायम रहा तो इन आर्यों ने कृष्ण के साथ नृशंसता बरतने के बावजूद उन्हें भगवान बना दिया और कृष्णवंशीय बहादुर जाति को अपने सनातन पंथ का हिस्सा बनाने में कामयाबी हासिल कर ली। जब कृष्ण अनार्य थे तो गीतोपदेश का सवाल उठना लाजिमी है गीतोपदेश में कृष्ण ने खुद भगवान होने, ब्राह्मण श्रेष्ठता, वर्ण व्यवस्था बनाने जैसे अनेक गले न उतरने वाली बातें कही हैं।
ऋ ग्वेद स्वयं ही गीता में उल्लेखित बातों का खंडन करता है। जब कृष्ण खुद वेद के अनुसार असुर और इंद्रद्रोही थे तो वे वर्ण व्यवस्था को बनाने की बात कैसे कर सकते हैं। गीता में ब्राह्मणवाद को मजबूत बनाने वाली जो भी बातें कृष्ण के मुंह से कहलवाई गई हैं वे सत्य से परे हैं। काले, अवर्ण असुर कृष्ण कभी भी वर्ण-व्यवस्था के समर्थक नहीं हो सकते। भारत के मूल निवासियों में अमिट छाप रखने वाले कृष्ण का आभामंडल इतना विस्तृत था कि आर्यों को मजबूरी में कृष्ण को अपने भगवानों में सम्मलित करना पड़ा। यह कार्य ठीक उसी तरह से किया गया जिस तरह से ब्राह्मणवाद के खात्मा हेतु प्रयत्नशील रहे गौतम बुद्ध को ब्राह्मणों ने गरुड़ पुराण में कृष्ण का अवतार घोषित कर खुद में समाहि करने की चेष्टा की।
जिस तरह से असुर कृष्ण की भारतीय संस्कृति आर्यों ने उदरस्थ कर ली उसी तरह बुद्ध की वैज्ञानिक बातों ने हिन्दू धर्म के अवैज्ञानिक कर्मकांडों के समक्ष दम तोड़ दिया। डॉ. आंबेडकर के बौद्ध धर्म ग्रहण करने के बाद अब भारत में कुछ बौद्ध नजर आ रहे हैं, वरना इन आर्यों ने बुद्ध को कृष्ण का अवतार और कृष्ण को विष्णु का अवतार घोषित कर कृष्ण एवं बुद्ध को निगल लिया था। कितनी विडंबना है कि विष्णु का अवतार जिस कृष्ण को बताया गया है, वह कृष्ण लगातार वेद से लेकर महाभारत ग्रंथ में इंद्र से लड़ रहा है।
ब्रिटेन में लैंकैस्टर विश्वविद्यालय के धार्मिक अध्ययन विभाग में मानद शोधकर्ता रहीं फ्रीडा मैशे ने एक किताब लिखी है - ‘कृष्ण, ईश्वर या अवतार? कृष्ण और विष्णु के बीच संबंध’. इसमें वे लिखती हैं कि कृष्ण-वासुदेव, पहले यादव समुदाय की सत्वत्त और वृष्णि जनजातियों के नायक हुआ करते थे. इन्हें समय के साथ-साथ देवता मान लिया गया। फिर दोनों एक हो गए।
कृष्ण का सबसे पहला जिक्र छठी शताब्दी ईसापूर्व में ‘छंदोग्य उपनिषद’ में मिलता है। चौथी शताब्दी ईसापूर्व में पाणिनि की ‘अष्टाध्यायी’ (संस्कृत व्याकरण का ग्रंथ) में कृष्ण को एक देव की तरह प्रस्तुत किया गया है। साथ ही इसमें वृष्णिवंशी यादव जनजाति के बारे में भी विस्तार से बताया गया है, जिससे कृष्ण जुड़े हुए थे। मौर्य राजदरबार में यूनान (ग्रीस) के दूत रहे मेगस्थनीज की किताब ‘इंडिका’ में बताया गया है कि किस तरह शूरसेनियों (वृष्णिवंशी यादवों की ही एक शाखा) ने मथुरा में कृष्ण को देवता की तरह पूजना शुरू किया। इस तरह चौथी शताब्दी ईसापूर्व में कृष्ण-वासुदेव न सिर्फ नायक से देवता के रूप में परिवर्तित हुए, बल्कि काफी लोकप्रिय भी हो चुके थे।
दूसरी शताब्दी ईसापूर्व तक वैदिक पूजा पद्धति कठोर हो चुकी थी और उसके धार्मिक संस्कार महंगे. इसी दौरान सम्राट अशोक के समर्थन और प्रचार कार्य की वजह से बौद्ध दर्शन अपना आधार बढ़ाता जा रहा था। इसी बीच, बड़े पैमाने पर विदेशी आक्रमणकारियों (जैसे शक आदि) का भारत में आगमन शुरू हो गया. वे बौद्ध दर्शन आदि से ज्यादा सहानुभूति रखते थे। ऐसे में, पुरोहित वर्ग के अधिकार और असर में कमी आने लगी. निचले वर्णों की आर्थिक स्थिति भी बेहतर हुई और उन्होंने वर्ण व्यवस्था को चुनौती देना शुरू कर दिया। और जैसा कि सुवीरा जायसवाल अपनी किताब ‘वैष्णववाद की उत्पत्ति और विकास’ में लिखती हैं - ‘ब्राह्मणों ने कृष्ण-वासुदेव के भक्ति-पंथ पर कब्जा कर लिया. वे कृष्ण को नारायण-विष्णु का स्वरूप बताने लगे। इसके पीछे उनका मकसद संभवत: सामाजिक आचार-व्यवहार में अपना अधिकार और प्रभुत्व एक बार फिर से स्थापित करना था.’ यहां जिक्र करना दिलचस्प होगा कि नारायण और विष्णु भी पहले अलग देवों की तरह पूजे जाते थे. बाद में दोनों को एक ही मान लिया गया।
दरअसल, ब्राह्मणवादी व्यवस्था और कृष्ण की व्यवस्था दो विपरीत धाराएं थीं। कृष्ण ने ब्राह्मणवादी व्यवस्था से जुड़ी हर बड़ी से छोटी चीज को बदल दिया था।
कृष्ण ने ब्राह्मणवादी व्यवस्था के ज्ञान मार्ग के विपरीत कर्म मार्ग की स्थापना की थी।
ब्राह्मणवादी व्यवस्था में भाग्यवाद था। इसके विरोध में कृष्ण ने पुरुषार्थ की स्थापना की थी।
कृष्ण ने ब्राह्मणवादी व्यवस्था से जुड़े स्वर्ग और नरक के विरोध में मोक्ष की स्थापना की थी।
ब्राह्मणवादी व्यवस्था में एकल जन्म की प्रतिष्ठा थी। कृष्ण ने इसके विरोध में पुनर्जन्म की स्थापना की थी।
ब्राह्मणवादी व्यवस्था में नदी घाटी सभ्यता की प्रतिष्ठा थी। हड़प्पा सभ्यता नदी घाटी सभ्यता थी। कृष्ण ने इसके विरोध में पहाड़ सभ्यता की स्थापना की यानी लोगों की बसावट पहाड़ के इर्द-गिर्द केंद्रित हो गयी। गोवर्धन पर्वत को उठाना इसी के बारे में बताता है।
कृष्ण की व्यवस्था में लाश पवित्र थी। इसी कारण परिजन स्वयं ढोकर ले जाते थे और लाश जलाते थे। महात्मा बुद्ध के अस्थि भस्मों पर चैत्य बनाये गये। ब्राह्मणवादी व्यवस्था में लाश अपवित्र थी। चांडाल ले जाता था और दफनाता था।
कृष्ण ने सुदर्शन का इस्तेमाल किया। सुदर्शन यानी सुंदर दर्शन। कृष्ण की सांख्यकारिका सुदर्शन का प्रतिनिधित्व करती है। अशोक चक्र वास्तव में
कृष्ण चक्र है। इसकी 24 लकीरें सांख्यकारिका के 24 तत्वों का प्रतिनिधित्व करती है। यह ब्राह्मणवादी दर्शन के विरोध में था।
ब्राह्मणवादी व्यवस्था का सबसे बड़ा आधार आत्मावाद था। कृष्ण ने इसका समापन कर दिया था। इसे ही बौद्ध व जैन धर्म ने अपनाया।
कृष्ण ने ब्राह्मणवादी व्यवस्था में प्रतिष्ठित मंदिर व मूर्तिपूजा को समाप्त कर दिया था। यही हीनयानी बौद्ध धर्म का आधार था। कृष्ण ने प्रतीक पूजा की स्थापना की। भगवान शिव के प्रतीक लिंग की पूजा आज भी जारी है।
पूजा का तरीका था-परिक्रमा करना। प्रतीक की परिक्रमा की जाती थी। भगवान गणेश ने भी शिव और पार्वती की परिक्रमा की थी। बौद्ध धर्म में स्तूप की परिक्रमा ही मुख्य रुप था।
कृष्ण की व्यवस्था के आधार पर बौद्ध व जैन धर्म पनपा।
महाभारत में पांच गणों का उल्लेख है-अंधक, वृष्णि, यादव, कुकुर व भोज। इन्होंने एक संघ के अंतर्गत स्वयं को संगठित किया। कृष्ण इसके प्रधान थे।
कृष्ण ने प्रतिष्ठित किया कि गणतंत्र का शासन विनय से चलता है।
ब्राह्मणवादी व्यवस्था में राजतंत्र था और दंड से चलाया जाता था। इसी कारण गणेश को विनायक कहा जाता है। यह एक उपाधि की तरह है। महात्मा बुद्ध ने भी विनय व धर्म को शास्ता (शासक) कहा। कृष्ण द्वारा प्रतिपादित पुरुषार्थ का पहला उद्देश्य धर्म था।
दक्षिण भारत में स्थानीय स्वशासन का महत्व लंबे समय तक बना रहा क्योंकि यह परंपरा का हिस्सा था और कृष्ण द्वारा स्थापित गणतांत्रिक व्यवस्था का अवशेष। इसी कारण राजाओं ने भी सम्मान दिया।
बाद में गणतंत्र के स्थान पर राजतंत्र का उदय होने लगा। जनपद महाजनपद बनने लगे। कृषि व्यवस्था का तेजी से प्रसार होने लगा। युद्ध में दास बनाये लोगों को कृषि दासता में धकेला जाने लगा। ऋणी लोगों को भी कृषि दासता में धकेला गया।
खैर, अभी अपनी बात को यहीं विराम देता हूँ।
यह ध्यान रहे कि परशुराम की मूर्ति स्थापित करने वाले श्री कृष्ण के उपासक नहीं हो सकते।
कंटेंट(सूरज यादव)
आप सबों को #जन्माष्टमी की शुभकामनाएं 🙏


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Anil Kumar अनिल कुमार
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