देश के कर्णधारों ने कभी सत्ता के विकेंद्रीकरण का स्वप्न देखा था और ग्राम स्तर तक सरकार को पहुचाने के लिए ग्राम पंचायत की व्यवस्था की थी , आज बिहार में उसी ग्राम पंचायत चुनाव का जश्न चल रहा है |हर व्यक्ति उसमे भागीदारी को तत्पर है |हर मोड़ , गली नुक्कड़ , गाँव की बाजारों में चुनावों की ही चर्चा है | चर्चा होना सहज है और आवश्यक भी है | किन्तु चर्चा जाति गत आकड़ों की न होकर विकास की योजनाओं की होनी चाहिए | भारत के गावों में आज भी गरीबी, अशिक्षा,बिमारी कुपोषण की तरह फैली हुई है | बीते वर्षों में विकास हुआ है किन्तु उसकी गति संतोष जनक नहीं रही है | सरकारों की योजनाओं ने नीति निर्धारकों और उनका संचालन करने वालों की तिजोरियां तो भरी लेकिन योजना का लाभ उपयुक्त व्यक्ति तक नहीं पहुचा |आज पंचायत चुनाव को कमाई का बहुत ही बड़ा साधन बना दिया गया है | नेतृत्वकर्ता चुनाव जीतने पर मिलने वाली शक्ति का उपयोग ग्राम विकास के लिए नहीं बल्कि स्वयं के विकास के लिए करता है | चूँकि अभी भी ग्रामीण भारत बहुत पीछे है इसलिए ग्राम स्तर पर आज भी अच्छे और समाज के हित के लिए काम करने वालों के लिए बहुत से अवसर हैं |जरूरत है इच्छाशक्ति की , अच्छी और विकासवाद की सोच की जो की जातिवाद के बंधन से मुक्त हो | संसाधनों की कमी नहीं रह गई है सरकार की बहुत सी योजनाये मददगार हो सकती है |सरकारी योजनाओ से ज्यादा ग्राम स्तर पर लोगों के जागरूक और संघठित होने की जरूरत है | शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, पर्यावरण, सामाजिक उत्थान ये वो विषय हैं जिनके सम्बन्ध में आज की ग्राम पंचायतों को सबसे अधिक सोचने की आवश्यकता है | मेरा ये अनुभव है की सूचना का अभाव विकास के दरवाजे बंद कर देता है |नेतृत्वकर्ता समाज को बहुत कुछ दे सकता है | ग्राम पंचायत स्तर पर चुनौतिया अधिक हैं लेकिन कुछ करने के अवसर उतने ही ज्यादा| आवश्यकता है चुनाव जीतकर उसको समाजसेवा का अवसर समझने की न की कमाई करने का अधिकार ।अन्ततः यही कहूँगा विकासकर्ता चुनें, तिजोरीभर्ता नहीं।।
~~राकेश कृष्णा

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